तुर्की अब भारत से खुलकर दुश्मनी निभाने लग गया है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन किया था। संयुक्त राष्ट्र में अक्सर कश्मीर पर पाकिस्तान का साथ देने वाले तुर्की ने हाल ही में एक और हिमाकत की है। उसने अमेरिका से आ रहे AH-64E अपाचे हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी में अड़ंगा लगा दिया।
माना जा रहा है कि तुर्की ने हेलिकॉप्टर को लेकर आ रहे मालवाहक जहाज को अपने एयरस्पेस से उड़ान भरने की इजाजत नहीं दी। इसके बाद यह कार्गो वापस अमेरिका लौट गय। इससे इन अपाचे हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी में और देरी होनी तय है। इसके अलावा, हाल ही में दिल्ली लालकिला ब्लास्ट मामले में ऐसी खबरें भी आईं कि पाकिस्तान के जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने इस धमाके की साजिश तुर्की में ही रची थी।
आतंकी उमर और मुजामिल तुर्की गए थे और वहां जैश ए मोहम्मद के हैंडलर्स के भी सबूत मिल रहे हैं। लंबी तैयारी यह थी कि 26/11 की तरह कई स्थानों पर एक साथ हमला कर दिल्ली को दहलाया जाए। तुर्की इतना बड़ा दुश्मन क्यों बन गया, यह समझते हैं।
गुलान मूवमेंट भी बन गई थी दुश्मनी की वजह
नवभारत टाइम्स की एक स्टोरी के अनुसार, 2016-17 में तुर्की में एक विद्रोह हुआ। तुर्की ने तुर्की के धार्मिक नेता फेतुल्लाह गुलान के संगठन को जिम्मेदार ठहराया था, जो अमेरिका में रह रहा था।
तुर्की ने उस वक्त ये आरोप लगाया था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA इस संगठन का इस्तेमाल कर तुर्की में तख्तापलट करना चाहती है। ये गुलान मूवमेंट भारत में भी काफी एक्टिव रहा है। तब तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने भारत से कहा था कि वो अपने यहां गुलान मूवमेंट के जो भी स्कूल या दफ्तर हैं, उन्हें बंद करवा दे।
माना जाता है कि उस वक्त भारत ने तुर्की की अपील अनसुनी कर दी। इसके बाद से ही राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन लगातार कश्मीर का मुद्दा उठाने लगे।
शीतयुद्ध में तुर्की ने अमेरिका का थामा दामन
भारत और तुर्की के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना 1948 में हुई। मगर, जब अमेरिका और रूस शीतयुद्ध में उलझे तो तुर्की अमेरिका के समर्थन में उतर आया। वहीं, भारत-रूस की गहरी दोस्ती थी, मगर भारत ने गुट निरपेक्षता को अपनाया। इसके बाद से तुर्की पाकिस्तान के करीब आता गया। क्योंकि पाकिस्तान भी अमेरिका का परंपरागत दोस्त बनता गया।
भारत में तुर्क शासकों को जनता ने अपनाया
भारत में दिल्ली सल्तनत की शुरुआत ही तुर्कों से शुरू हुई थी। चार वंश गुलाम वंश (या मामलुक वंश), खिलजी वंश, तुगलक वंश और सैयद वंश मूल रूप से तुर्क थे। यहां तक कि मुगल साम्राज्य की स्थापना करने वाला जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर के खून में भी तुर्की का अंश था।
वह अपने पिता की तरफ से तुर्क-मंगोल शासक तैमूर का वंशज और मां की तरफ से मंगोल शासक चंगेज खान का वंशज था। उसका परिवार चग़ताई तुर्क (Chagatai Turks) के वंश से था। यहां तक कि अपनी आत्मकथा ‘तुजुके बाबरी’ भी बाबर ने मूल रूप से तुर्की में ही लिखी थी।
तुर्की पर भारत का यह बहुत बड़ा कर्ज
साल 1912 में बाल्कन युद्धों के दौरान मशहूर भारतीय स्वतंत्रता सेनानी डॉ. एमए अंसारी के नेतृत्व में तुर्की के लिए चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई गई थी। इस भारतीय मिशन ने युद्ध में घायल तुर्की सैनिकों की दिन-रात देखभाल की और उनकी जान बचाई। बाल्कन युद्ध में उनकी चिकित्सा सेवा के लिए उन्हें तुर्की ने ‘ऑर्डर ऑफ ओस्मानिये’ से सम्मानित किया गया, जो ओटोमन साम्राज्य का मशहूर सम्मान है।
इसके अलावा, भारत ने 1920 के दशक में तुर्की के स्वतंत्रता संग्राम और तुर्की गणराज्य के गठन में भी सहयोग दिया था। प्रथम विश्व युद्ध के अंत में तुर्की पर हुए अन्याय के खिलाफ महात्मा गांधी ने भी उनका साथ दिया था। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता की घोषणा के ठीक बाद तुर्की ने भारत को मान्यता दी और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए। हिंदी और तुर्की भाषाओं में 9,000 से भी अधिक शब्द समान हैं।